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Swati Pathak
@Swatidropsoflife
Gurgaon

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Poem Published about 3 years ago

हिंदी दिवस (14.09.2016)
"मैं हिंदी हूँ"

बदल गया कुछ आकार मेरा,
मैं हिंदी हूँ, पर नहीं पहले सा प्रकार मेरा,
उतनी कठिन नहीं अब प्रस्तुति मेरी,
बड़ा Easy हुआ है अब सार मेरा।।

मेरे सृजन (creation) में था निहित मेरा अस्तित्व,
SMS Text ने बदल दिया है कुछ यूँ अलंकार मेरा-
क्यूँ कहूँ, "मुख मानो चन्द्रमा सा, सरल सहज सा स्वभाव"
जब OMG ने ही निपटा दिया है काम मेरा।
हास्य प्रमाद का अलग ही है अब ढ़ग,
LOL कहदो तो Coolता से बढ़ता है सम्मान मेरा।
संजो कर रखते हैं ह्रदय में अब मुझको,
"भीड़ में उच्चारण निषेध" यूँ हो गया है Demand मेरा।।

मैं मातृ भाषा, माँ का सा दिल विशाल रखती हूँ,
English हो या Urdu शामिल मुझमे, सन्तान के समान रखती हूँ,
कोई द्वेष नहीं कोई पीड़ा नहीं,
अपनी नीव के बल पर खुद को संभाल रखती हूँ;
बदला हो भले ही कुछ आकार मेरा,
मैं हिन्दी हूँ, मैं आज भी तुझमें अपने संस्कार रखती हूँ।

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Swati Pathak
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बचपन वो दोबारा चाहिए
Poem Published over 3 years ago

माँ तेरे आँचल का सहारा चाहिए,
खोई सी मैं हूँ लहर, किनारा चाहिए ;
जो देखा था तूने ख्वाब वो पूरा हो जाएगा,
जो चाहा पा लूँ मुकाम वो मुझको मिल जाएगा,
फिर से पुकारे तू मुझे,
बचपन वो दोबारा चाहिए।।

माँ तेरे आँचल का सहारा चाहिए,
तन्हा हूँ मैं भीड़ में, इशारा चाहिए ;
आ डाट ले एक बार,
इस बार ना करना माफ,
फिर से लगाए तू गले,
गुज़रा वो ज़माना चाहिए।।

माँ तेरे आँचल का सहारा चाहिए,
किससे मैं मांगू मुझे अब क्या चाहिए,
कौन समझे बिन कहे अब क्या चाहिए।।

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Swati Pathak
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जाने वो क्या थी
Poem Published over 3 years ago

जाने वो क्या थी,
कोई छवि पुरानी यादों की,
या बन्द किताब रहस्यमयी बातों की,
जाने वो क्या थी।।

भावुक कल्पना का सा स्वरूप,
शायद अपने घुंघराले उलझे-सुलझे बालों जैसी ।
स्थिर समन्दर की लहर-सी,
शायद अपनी गहरी काली आँखों जैसी ।
जाने वो क्या थी ।।

सरल सकल स्पष्ट स्वभाव कभी, 
कभी विचलित व्यथित व्यंग्य विचारों जैसी । 
जितना गहरा कोई उतरा, उतना गहरा पाया,
शायद अपने मर्दुल मीठे स्वभाव जैसी।
जाने वो क्या थी, जाने वो क्या थी ।। 

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Swati Pathak
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"ना बोले तू, ना बात मैं करु"
Poem Published over 3 years ago

ना बोले तू, ना बात मैं करु,
ना खत्म तू करे, ना शुरुआत मैं करूँ।

बस यूँही राहो-गुज़र में जिन्दगी गुज़र जाये,
ना हिसाब तू करे ना हिसाब मैं करूँ।।

बहुत संजो ली पिघलते मोम-सी यादें,
ना अब हकीकत को आग तू करे, ना ख़्वाबों को चिराग मैं करूँ,

ना बोले तू, ना बात मैं करु,
ना खत्म तू करे, ना शुरुआत मैं करूँ।

जो पहुंच भी जाये गूँजकर कानों तक दिल की पुकार,
ना शोर तू करे, ना आवाज़ मैं करूँ।

तेरी पहुंच तक का सफर तय कर ना पाए कदम शायद,
मगर ना कोई गिला तू करे, ना माफ मैं करूँ।

ना बोले तू, ना बात मैं करु,
ना खत्म तू करे, ना शुरुआत मैं करूँ।।

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Swati Pathak
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राहें
Poem Published over 3 years ago

मुख्तलिफ (different) थी राहें सबकी, मंजिलों की भी होड़ सी थी।
बहतरीन रहा सफर ऐ जिन्दगी ! चंद पलों की दौड़ सी थी।।

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Swati Pathak
@Swatidropsoflife
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